गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में गाए जाने वाले गीतों में से एक गीत यह भी है।
इस गीत का भाव यह है की प्रकृति का प्रत्येक अंग कुछ ना कुछ हमें हर पल दे ही रहा है और हमसे कुछ लेने की उम्मीद भी नहीं कर रहा है, इसी प्रकार प्रकृति से सीखते हुए हम भी इस देश को, इस समाज को, अपने राष्ट्र को, अपने गांव को, कुछ देना सीखे।
हम अपने स्वार्थ में ही ना खो जाए।
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें ॥धृ॥
सूरज हमें रौशनी देता, हवा नया जीवन देती है ।
भूख मिटने को हम सबकी, धरती पर होती खेती है ।
औरों का भी हित हो जिसमें, हम ऐसा कुछ करना सीखें ॥१॥
गरमी की तपती दुपहर में, पेड़ सदा देते हैं छाया ।
सुमन सुगंध सदा देते हैं, हम सबको फूलों की माला ।
त्यागी तरुओं के जीवन से, हम परहित कुछ करना सीखें ॥२॥
जो अनपढ़ हैं उन्हें पढ़ाएँ , जो चुप हैं उनको वाणी दें ।
पिछड़ गए जो उन्हें बढ़ाएँ, समरसता का भाव जगा दें ।
हम मेहनत के दीप जलाकर, नया उजाला करना सीखें ॥३॥
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें॥
बहुत सुंदर गीत आदरणीय भाई साहब जी
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